Friday, June 28, 2013

The "Raanjhanaa Movie Review by Kamal R Khan

Copy of FIR presented as regards denigrating casteist words of actor Kamal R Khan

अभिनेता कमाल खान द्वारा अनुसूचित जातियों का अपमान, दी गयी एफआईआर की प्रति--

सेवा में,
थाना प्रभारी,
थाना गोमतीनगर,
जनपद लखनऊ

विषय- श्री कमाल आर खान द्वारा राँझना नामक फिल्म की रिव्यू में अत्यंत ही निंदनीय आपराधिक टिप्पणी के सम्बन्ध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने हेतु

महोदय,
कृपया अनुरोध है कि मैं अमिताभ ठाकुर, पेशे से आईपीएस अधिकारी स्थायी पता- निवासी 5/426, विराम खंड, गोमती नगर, लखनऊ हूँ. मैं आपके समक्ष श्री कमाल आर खान पता- बँगला नंबर 7/70, महादा एस वी पी नगर, निकट वर्सोवा टेलीफोन एक्सचेंज, अँधेरी (वेस्ट), मुंबई- 400053, फोन नंबर-022 - 26375425 / 26 / 27 / 28 / 29 / 30, ईमेल kamalintlbom@hotmail.com / kamaalrkhan@hotmail.com द्वारा हाल में ही प्रदर्शित एक फिल्म राँझना के सम्बन्ध में एक विडियो रिव्यू में प्रयुक्त किये गए अत्यंत ही निंदनीय, जातिसूचक, आपराधिक शब्दों और टिप्पणियों को आपके समक्ष इस अनुरोध के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इस सम्बन्ध में तत्काल प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर अग्रिम कार्यवाही करने की कृपा करें.

मुझे यूट्यूब पर प्रसारित होने वाले इस विडियो रिव्यू (रिकॉर्डिंग) की सूचना एक मित्र के माध्यम से मिली और मैंने वेबसाईट लिंक http://www.youtube.com/watch?v=WwVKjmsS37U पर “Raanjhanaa Movie Review by KRK | KRK Live” शीर्षक यह विडियो अपने निवास पर देखा. यह विडियो 9.40 मिनट का है और यह 20 जून 2013 को लोड किया गया बताया जा रहा है.

इस विडियो रिव्यू में इस फिल्म के हीरो श्री धनुष के लिए अत्यंत ही आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गयी हैं पर चूँकि वे पूर्णतया व्यक्तिगत टिप्पणियाँ हैं अतः मैं उन पर कुछ नहीं कहना चाहता.

जिस विषय को मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ वह है श्री कमाल आर खान की टिप्पणी- “सर, पता नहीं आप यूपी से हैं या नहीं है, बट मैं यूपी से हूँ. पूरे यूपी में जैसा धनुष है वैसे आपको भंगी मिलेंगे, चमार मिलेंगे, बट एक भी इतना सड़ा हुआ पंडित आपको पूरे यूपी में कहीं नहीं मिलेगा.”

स्पष्ट है कि श्री कमाल आर खान की यह टिप्पणी सीधे-सीधे जातिसूचक है. यह अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की धारा 3(1)(x) के अंतर्गत अपराध है.

इस अपराध की भयावहता इस कारण और भी बढ़ जाती है कि यह टिप्पणी एक पढ़े, लिखे, सामाजिक हैसियत वाले एक कथित फिल्म स्टार द्वारा आज के इक्कीसवीं सदी के समाज में की गयी है और इस कारण से श्री कमाल खान का आचरण पूरी तरह अक्षम्य है.

मैं स्वयं इन जातियों से नहीं हूँ पर एक बुद्धिजीवी और सामाजिक रूप से संवेदनशील व्यक्ति होने के नाते मैं भी श्री खान के इस अत्यंत घृणित और बेतुके टिप्पणी से अन्तःस्थल तक आहत और अचंभित हूँ और इस रूप में इस प्रकरण में सामने आ कर कठोरतम विधिक कार्यवाही संपन्न कराना अपना नैतिक और विधिक कर्तव्य समझते हुए आपके सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ. यह सादर निवेदन करूँगा कि श्री कमाल खान की उपरोक्त टिप्पणी किसी भी प्रकार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अथवा मनोरंजन हेतु दिया गया वक्तव्य नहीं है बल्कि सीधे-सीधे दो अनुसूचित जाति के लोगों पर घृणित और ओछी टिप्पणी है.

अतः मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उपरोक्त आपराधिक कृत्य के संज्ञेय अपराध होने के कारण धारा 154 सीआरपीसी के अंतर्गत इनके सम्बन्ध में उपयुक्त तथा विधिसम्मत धाराओं में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर आवश्यक कार्यवाही करने की कृपा करें. मैं विशेषकर निवेदन करूँगा कि अनुसूचित जाति के प्रति किये गए इस इस अत्यंत गंभीर अपराध के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज किया जाना और आज के समय में भी इस प्रकार की घटिया सोच रखने वाले लोगों पर दंडात्मक कार्यवाही किया जाना न्याय हित में नितांत आवश्यक प्रतीत होता है.
भवदीय,

पत्र संख्या- AT/Kamal/01 (अमिताभ ठाकुर)
दिनांक- 28/06/2013 5/426, विराम खंड,
गोमती नगर , लखनऊ
94155-34526

Saturday, June 22, 2013

From no enemies to quarrelsome


Once upon a time I was posted as SP Deoria. There a person who used to be in regular company with me and about whom his adversaries warned me that his proximity his harming my reputation because he had the reputation of being a tout and middleman in the police department but I blandly ignored these suggestions because I had no other relation with him except considering him a friend, had once praised me these words-“You are person with no enemies.”

What he wanted to say was that no person (specially the political persons) opposed me despite his belonging to a political party other than one which was in power in the State.

There were specific reasons for what he said. At that time, that is during the initial years of my service, my fundamental process of thinking was that as an officer and as a human being I shall not only behave equally with every person, but shall also endeavour to act in a manner that does not hurt others.

Today I do openly admit that this approach was guided as much by my nature of treating everyone at par as by tendency of self-defence so that no one got annoyed or alienated with me.

In contrast to this, when I compare my behaviour today where I am willing for head-on collision with every second person, I really feel happy about myself and feel pitiful for that “No enemy” man of Deoria who existed within me once upon a time.

अजातशत्रु बन गया पंगेबाज



मैं किसी समय एसपी देवरिया के पद पर तैनात था. वहाँ एक सज्जन जो रोज मेरे पास उठते-बैठते थे और जिनके बारे में उनके विरोधी मुझे कहते कि उनके साथ मेरी कथित नजदीकियों से मेरी बदनामी हो रही है क्योंकि संभवतः उनकी छवि एक दलाल की थी पर मैं ये बातें नहीं मानता क्योंकि मेरा उनसे सिवाय मित्रता के कोई अन्य सम्बन्ध नहीं था, ने एक बार मुझे मेरी तारीफ़ करते हुए कहा था आप तो अजातशत्रु हैं.

उनका मतलब यह था कि कोई भी व्यक्ति (खास कर राजनैतिक व्यक्ति) मेरा विरोध नहीं करता भले वह उस राजनैतिक दल का नहीं हो जिसके द्वारा सरकार बनायी गयी हो.

इसका कारण भी था. उस समय, यानि अपनी नौकरी के शुरुवाती दिनों में, मेरी आधारभूत सोच यह थी कि एक अफसर और एक व्यक्ति के रूप मुझे सबों से समान व्यवहार तो करना ही चाहिए, साथ ही यह भी प्रयास करना चाहिए कि उन्हें मेरे किसी कार्य अथवा शब्द से कोई कष्ट नहीं पहुँच जाए.

मुझे आज यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि मेरी इस प्रवृत्ति के पीछे सबों के प्रति समान आचरण के अलावा स्वरक्षा की भावना भी होती थी कि कहीं कोई नाराज़ नहीं हो जाए.

इसके विपरीत आज जब खुद को किसी बिगडैल सांड की तरह कई जगहों पर पंजेबाजी  में लगा हुआ देखता हूँ, तो सचमुच खुद पर अच्छा लगता हैं और देवरिया के उस "अजातशत्रु" के प्रति कुछ दया की भावना ही उभरती है.

Thursday, June 20, 2013

UP IPS Association vs Amitabh Thakur




Your pique does hurt,
but it has elements of delusion,
I think in my own way,
resulting in a few tangles.

I do want to get your love,
your support and your affection,
but a few restraints and responsibilities,
my inner urge overpower things.

A time shall come,
when you shall think like me,
 the distances presently seen,
shall get eroded all by itself.

These are a few words I have written for those friends in my service with whom I have a permanent and apparently deep fissure in our thoughts. Of the various issues on which we seem to be standing apart, one is related with an Association for the subordinate police officers.

Actually there is a Police Forces (Restriction of Rights) Act 1966. Under section 3(1) of this Act, any policeman in Uttar Pradesh can form an association only after taking due permission from the State government.
As per the RTI information, the UP IPS Association has not been granted the required permission by the State government and yet it is quite active. This prima facie seems to be an offence under section 4 of this Act.
When I quote these facts and talk of the need of a Unified Police Association in UP, many of my friends dissuades me by saying that IPS officers and the subordinate police officers cannot be placed on the same plank. On the contrary I feel that the entire Police Department is one entity. We can do good or bad together. We are known in the society as one Unit. Hence we need to get rid of these artificial divisions. I know that many of my friends do agree with me in their heart but the peer pressure stops them from coming forth and being more vocal.
It is this reason that drives me in my endeavour to form a Unified Police Association and in this process am ready to face the wrath of others.
The way many of the IPS officers think in different ways as regards their IPS Association and the association of subordinate police officers goes against the basic premises of the Constitution of India.
I went to the High Court for this where I was directed that if I have any grievance against the Uttar Pradesh I.P.S. Association, as it exists today, I may approach concerned authorities for appropriate action in accordance with law.

I have presented my facts before various appropriate places. Now the only way seems to be to get an FIR registered in this regards. Many friends might get angry on this but I am fully convinced that a timer will come when they will realize that I was correct in my thinking. Today the need is not to think in partisan manner to create artificial divisions in the police monolith but to think of the police as a single entity. I am dedicated to this cause with all my commitment.  

A time shall come,
when you shall think like me,
 the distances presently seen,
shall get eroded all by itself

Amitabh Thakur

यूपी आईपीएस एसोसियेशन बनाम अमिताभ ठाकुर




तेरी नाराजगी का गम तो है,
क्या करूँ कुछ भ्रम भी है,
मैं अपनी तरह से सोचता,
इस सोच में उलझन भी है.

मैं चाहता हूँ तेरा प्यार मिले,
तेरा साथ और इकरार मिले,
कुछ बंदिशें हैं जिम्मेदारियां
मेरी जुत्सजू हमकदम भी है.

कभी वक्त ऐसा आएगा
मेरी सोच में ढल जाएगा
ये जो दूरियां दिखती अभी
खुदबखुद मिट जाएगा.

ये चंद शब्द मैंने अपने सर्विस के उन साथियों के लिए लिखा है जिनसे मेरी सोच में कई बिंदुओं पर नाइत्तेफाकी बन जाती है. जिन मुद्दों पर व्यक्तिगत रूप से हम अलग-अलग खड़े दिखते हैं उनमे एक मुद्दा अधीनस्थ सेवा के अधिकारियों के लिए एसोसियेशन का है.

दरअसल एक एक्ट है पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966. इसकी धारा 3(1) के अंतर्गत उत्तर प्रदेश शासन से अनुमति लेने के बाद ही पुलिस में कोई एसोसियेशन आदि बन सकता हैं.

आरटीआई से प्राप्त सूचना के अनुसार यूपी आईपीएस एसोसियेशन कोई शासन से कोई अनुमति नहीं है, फिर भी वह सक्रीय हैं. इस प्रकार यह एक्ट की धारा चार में कानूनी अपराध है.

जब मैं इसका हवाला दे कर अपने साथियों से पूरे पुलिस के लिए एकीकृत पुलिस एसोसियेशन बनाए जाने की बात करता हूँ तो मेरे कई साथी कहते हैं कि आईपीएस की बात अलग है, दरोगा सिपाही की अलग. इसके विपरीत मैं यह मानता हूँ कि पूरा पुलिस विभाग एक है. हम एक साथ ही अच्छा या बुरा कर सकते हैं. यह समाज में एक ईकाई के रूप में जाने जाते हैं. अतः इस कृत्रिम बंटवारे से ऊपर उठें. मैं यह जानता हूँ कि मेरे कई साथी ह्रदय से मेरी बात पूरी तरह मानते हैं पर शायद उन पर ग्रुप प्रेसर हावी हो जाता है.

बस इसीलिए पूरे पुलिस के लिए एक एकीकृत एसोसियेशन बनाए जाने को प्रयासरत हूँ और इसके लिए कोई भी नाराजगी झेलने को तैयार हूँ.

कई आईपीएस अधिकारियों द्वारा अपने लिए एसोसियेशन बनाने का अलग नियम और दूसरों के लिए अलग नियम की बात सोचना संविधान की मूल अवधारणा के खिलाफ है.

इस बारे में हाई कोर्ट भी गया. आदेश मिला कि यदि वादी को उत्तर प्रदेश आईपीएस एसोसोयेशन के विरुद्ध कोई शिकायत है तो वह सम्बंधित अधिकारियों के पास विधि के प्रावधानों के अनुरूप प्रार्थना कर सकता है.

कई बार इस बारे में आवश्यक स्थानों पर अपनी बात रख चुका हूँ. अब एक ही रास्ता दिखता है कि क़ानून के तहत एफआईआर करने को आगे बढूँ. कई साथी आज भले नाराज़ होएँगे, लेकिन एक दिन यह मानेंगे कि मैं अपनी जगह सही पर था. आज का समय पुलिस में कृत्रिम भेदभाव का नहीं, समरूपता और बराबरी की सोच का है और मैं इस बारे में अपनी औकात भर काम करने को कृतसंकल्प हूँ. 

कभी वक्त ऐसा आएगा
मेरी सोच में ढल जाएगा
ये जो दूरियां दिखती अभी
खुदबखुद मिट जाएगा.

Wednesday, June 19, 2013

Copy of FIR in Defamation case



सेवा में, 
थाना प्रभारी,
थाना गोमतीनगर,
जनपद लखनऊ 

महोदय,
     कृपया निवेदन है कि मैं डॉ नूतन ठाकुर पत्नी श्री अमिताभ ठाकुर, निवासी  5/426, विराम खंड, गोमती नगर, लखनऊ हूँ. मैंने अपने पति श्री अमिताभ ठाकुर तथा एक अन्य व्यक्ति के साथ मिल कर व्यापक जनहित में दिनांक 06/11/2012 को विभिन्न अधिकारियों को सहारा क्यू शॉप आदि के सम्बन्ध में एक शिकायती पत्र भेजा था.     
हमें इस सम्बन्ध में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज, महाराष्ट्र, मुंबई के पत्र दिनांक
21/01/2013  के साथ डाइरेक्टर, सहारा क्यू शॉप यूनिक प्रोडक्ट्स रेंज लिमिटेड, रजिस्टर्ड कार्यालय- होटल सहारा स्टार, निकट डोमेस्टिक एयरपोर्ट, विले पार्ले ईस्ट, मुंबई-400099 का एक पत्र दिनांक 21/12/2012 प्राप्त हुआ. इस पत्र में उन्होंने हमारी शिकायतों को गलत बताया. हमें इन कथनों पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि मेरी शिकायतों से असहमत होना उनके लिए स्वाभाविक है.    
जिस बिन्दु पर हमें सख्त ऐतराज़ हुआ था वे डाइरेक्टर साहब के ये शब्द थे-“
The complainants are trying to take help of such judgement to create biases in the Regulators so that complainant may achieve their goals for their vested reasons to get Companies operations de-established. These complainants are probably acting as White-collar extortionist.” अर्थात शिकायतकर्ता अधिकारियों के मन में भ्रान्तिपूर्ण तरीके से अपने निहित स्वार्थों/कारणों से पूर्वाग्रह पैदा कर कंपनी के कार्यों को अस्थिर करना चाहते हैं. ये शिकायतकर्ता संभवतः सफेदपोश उगाहीकर्ता के रूप में कार्य कर रहे हैं.     
इन शब्दों को मानहानि कारक मानते हुए मैंने और मेरे पति ने दिनांक
 01/02/2013  के अपने पत्र द्वारा डाइरेक्टर साहब से अपनी कही बातों पर स्थिति स्पष्ट करने अथवा निशर्त माफ़ी मांगने का आग्रह किया. कोई उत्तर नहीं आने पर पुनः अपने पत्र दिनांक 02/05/2013  से इस हेतु अतिरिक्त समय दिया. अब वह निर्धारित अवधि दिनांक 31/05/2013 भी बीत चुकी है और प्रतिवादी की तरफ से अब तक कोई भी उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है. मैं सम्बंधित पत्रों की छायाप्रति साक्ष्य के रूप में संलग्न कर रही हूँ.
यद्यपि प्रतिवादी द्वारा भेजे गए पत्र की प्राप्ति के समय से ही अपराध कारित हो गया था पर हमने पहले प्रतिपक्ष को अपनी बात कहने या प्रकरण में माफ़ी मांगने का अवसर देना उचित समझा था कि ताकि यदि अनजाने में कोई बात हो गयी हो तो उसका निराकरण हो जाये. प्रतिवादी की लगातार चुप्पी यह स्थापित करती है कि वे अपने शब्दों पर कायम हैं जो प्रथमद्रष्टया हमारे ख्याति की अपहानी होने के नाते धारा
499 आईपीसी में परिभाषित मानहानि का अपराध बनता दिखता है जिसकी सजा धारा 500 आईपीसी में दी गयी है, जो असंज्ञेय अपराध है, अतः आपसे निवेदन है कि उपरोक्त तथ्यों के आधार पर धारा 500 आईपीसी के अंतर्गत एनसीआर पंजीकृत करने की कृपा करें.
                                                     
     भवदीया,                                                         
 पत्रांक संख्या – NT/Sahara Q/01                                      (डा. नूतन ठाकुर)
 दिनांक – 17 /06/2013                                        5/426, विराम खंड, ,
                                 गोमती नगर, लखनऊ                                 
                                 #  94155-34525                       

बिना जिम्मेदारी के बोल- मानहानि का मुक़दमा

शायद हमारे देश में कई लोग बिना आधार और बिना जिम्मेदारी के भाव के कुछ भी बोलने की आज़ादी समझते हैं.

कुछ दिन पहले मैंने और नूतन ने कुछ तथ्यों के आधार पर सहारा क्यू शॉप कंपनी द्वारा पैसा जमा कराये जाने की जांच कराने की मांफ की थी. इस पर सहारा क्यू शॉप के डाइरेक्टर ने अपना जो जवाव दिया, उसमे आरोपों को तो झूठलाया ही , साथ ही हम लोगों पर ही उलटे यह आरोप लगा दिया कि हमने ऐसा अपने निहित स्वार्थवश कंपनी को अस्थिर करने के लिए किया है और हम सफेदपोश उगाही करने वाले (व्हाईटकॉलर एक्सटोर्सनिस्ट) हैं .

हमने दो-दो बार लीगल नोटिस भेज कर डाइरेक्टर साहब से पूछा कि आखिर उनके इन आरोपों का आधार क्या है? हमने कहा कि या तो वे अपने आरोपों को पुष्ट करें या फिर अपनी गलती स्वीकार कर लें लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया.

इस पर अब नूतन ने डाइरेक्टर साहब के खिलाफ थाना गोमती नगर, लखनऊ में धारा 500 आईपीसी के तहत मानहानि का मुक़दमा दर्ज कराया है.

इस पर आपकी क्या टिप्पणी है?

Defamation suit for unsubstantiated allegations

There seems to a substantial section of our society who believe in complete freedom as regards their use of words- proper or improper, temperate or intemperate, substantiated or unsubstantiated.

A few months ago I and wife Nutan had sent a complaint to enquire into alleged collection of money through Sahara Q shop scheme against the provisions of law, basing ourselves on certain facts.

In his reply, Director, Sahara Q shop not only denied the charges, he made a counter allegation that we are acting with vested reasons to get Companies operations de-established and are White-collar extortionist.

We sent legal notice twice requesting the Director either to present facts in support of his statements so as to explain why he made such allegations or to seek unconditional apology. No response came.

To this Nutan has registered an FIR against Director, Sahara Q Shop, Mumbai under section 500 IPC related with defamation for using inappropriate words without substantiating them with reasons.

Would like to get your reaction to this.



Tuesday, June 18, 2013

परम गोपनीय (हिंदी कविता)



एक बात
समझ नहीं आई
बुलाई गयी बैठक
जंगल की राजधानी में
बेहद संवेदनशील मुद्दा
बहुत गोपनीय बैठक
मीटिंग में बैठे
जंगल के
ख़ुफ़िया प्रमुख
जांच प्रमुख
क़ानून व्यवस्था सचिव
और एक
पूर्व जांच प्रमुख
यानि मसला
महा गोपनीय
पर पूरी बात
पूरी की पूरी बात
किसने क्या कहा
जो कहा क्यों कहा
और आगे क्या होगा
सब अखबारों में
सारे अख़बारों में
सवाल यह
यदि इतनी ख़ुफ़िया मीटिंग
सारे जंगल के सामने
इस तरह खुलेआम
फिर गोपनीयता की जरूरत क्या
और बार-बार
बिलावजह
आरटीआई का सहारा क्यों?

अमिताभ

(हाल की एक उच्चस्तरीय सरकारी मीटिंग की खबरों को पृष्ठभूमि बनाते हुई लिखी गयी है यह कविता)

सब बनाम कुछ (कविता)



"सब जानता हूँ मैं"
जब कहते हैं हम,
हम खुद नहीं जानते,
सब माने क्या होता है?

"सब यही कहते हैं"
ऐसा हम तो देते हैं,
सब में कौन-कौन हैं,
यह बिलकुल नहीं जानते.

"सब मुझे जानते हैं"
दावा करते हैं हम,
बिना यह जाने-समझे
पडोसी हमारा नाम जानता है?

"सब" बहुत बड़ा शब्द है,
सब यानि कोई छूटा नहीं,
कम से कम यह तो समझ लें,
"कुछ" मतलब "सब" नहीं है

अमिताभ

Sunday, June 16, 2013

Happy Birth Day to Amitabh Thakur

Happy Birth Day to Amitabh Thakur

Amitabh Thakur was born on 16 June 1967 but keeping in tradition the Bihari style of saving a few years so as to have as many extra years in the Government job that he would later enter, as he actually did when he joined the Indian Police Service in the year 1992, he had an official reincarnation on 16 June 1968.

Thus Amitabh lived in a state of "to be born next year" between 16 June 1967 and 15 June 1968 and thus finally and truly he arrived for all the official documents on 16 June 1968.

Summing it up, 1967 or 1968, the fact remains that 16 June of the English Calender, which is the 167th day of the year (168th in leap years) in the Gregorian calendar, on which Ford Motor Company was incorporated in 1903 and IBM in 1911, as also the date on which in 1904 Irish author James Joyce begins a relationship with Nora Barnacle and subsequently uses the date to set the actions for his novel Ulysses; this date now being traditionally called "Bloomsday" because of this historic act, Amitabh also bloomed on two different occasions- one in reality and other officially.

You may wish him happy Birthday if you feel like, with a rider that wish him good wishes only when you have a true and genuinely affectionate feeling towards him.

अमिताभ ठाकुर को जन्मदिन मुबारक



अमिताभ ठाकुर का जन्म 16 जून 1967 को हुआ था पर कुछ अधिक वर्षों तक सरकारी नौकरी कर सकने के योग्य बनने के लिए आदमी के उम्र में से कुछ साल चुरा लेने की महान बिहारी परम्परा का निर्वहन करते हुए उसका आधिकारिक पुनर्जन्म अगले वर्ष 16 जून 1968 को हुआ और आगे चल कर वर्ष 1992 में भारतीय पुलिस सेवा का हिस्सा बन कर उसने इस एक वर्ष के आधिकारिक अंतर की उपयोगिता भी साबित की.

इस प्रकार अमिताभ 16 जून 1967 से 15 जून 1968 के मध्य की अवधि में “जन्म लेने की तैयारी की अवस्था” में रहा और अगले वर्ष 16 जून 1968 को उसने आधिकारिक रूप से इस संसार के सभी अभिलेखों में प्रवेश किया

मतलब यह कि 1967 हो या 1968, तथ्य यही है कि अंग्रेजी कलेंडर के 16 जून की तिथि, जो ग्रेगरी कलेंडर का वर्ष का 167वां (लीप वर्ष में 168वां) दिन होता है, जिस तिथि को वर्ष 1903 में फोर्ड मोटर कंपनी और वर्ष 1911 में आईबीएम की स्थापना हुई और जिस दिन वर्ष 1904 में आयरिश लेखक जेम्स जोयस ने नोरा बार्नेकल के साथ अपना सम्बन्ध प्रारम्भ किया और जिस दिन का इस्तेमाल उन्होंने बाद में अपने उपन्यास यूलिसिस की क्रियाओं को प्रारम्भ करने के लिए किया जिसके कारण यह दिन अब ब्लूम्सडे के रूप में भी पुकारा जाता है, को अमिताभ नामक यह शख्स भी इस संसार में दो बार ब्लूम (पुष्पित) हुआ- एक बार हकीकत में और एक बार आधिकारिक हैसियत से.

यदि आप चाहें तो उस अमिताभ को जन्मदिन मुबारक कह सकते हैं लेकिन शर्त यही है कि आप ऐसा तभी कहें जब आपके मन में उसके प्रति वास्तविक स्नेह और उदगार की भावना हो.

Thursday, June 13, 2013

शशांक शेखर सिंह: शहर और सत्ता



जिस व्यक्ति की अंत्येष्ठी होने वाली थी वह कभी मेरे पसंदीदा लोगों में नहीं थे. मैं स्वयं चाहे जैसा भी होऊं- अच्छा या बुरा, नीतिपरक या अनैतिक, पर मेरे मन में हमेशा वैसे लोगों के प्रति ही सम्मान की भावना रही है जो वास्तव में विधि का उसकी सम्पूर्णता में पालन करने में विश्वास रखते हैं. उदाहरण के लिए यदि मैं कोई नाम यकबयक लूँ तो मुझे देवेश चतुर्वेदी की याद आएगी जो पिथोरागढ़ और देवरिया में मेरे जिलाधिकारी रहे थे और जिनके लिए कानून से बड़ा कुछ नहीं दिखता था.

मैंने शशांक शेखर सिंह, जिन्हें बहुधा ट्रिपल एस नाम से भी पुकारा जाता था, के बारे में जितना भी सुना था, उससे हमेशा उनकी इमेज से कुछ कटा-कटा सा रहता था. मेरी सोच में वे एक ऐसे व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते थे जो कानून के लिए नहीं बना था बल्कि जिनके लिए स्वयं क़ानून अपने आप को बदल दिया करता था. फिर मैं अकेला ऐसा आदमी नहीं था जो उनके बारे में इस तरह सोचता हो. नौकरशाही में एक बड़ा हिस्सा अपनी निजी बातचीत में इस तरह के विचार रखता दिख जाता था.

लेकिन जैसी कहावत है- “सफलता से बड़ा कोई मन्त्र नहीं” और शशांक शेखर ने उत्तर प्रदेश और उनकी राजधानी लखनऊ यानि कि हमारे इस शहर पर कुछ इस प्रकार राज किया जैसा विरले ही नौकरशाह को अवसर मिला हो.

वर्ष 2007-2012 की अवधि ने उनकी इस ख्याति में और भी श्रीवृद्धि की और इस दौरान यदि लखनऊ का कोई एक नौकरशाह दिल्ली या अन्य प्रदेशों में जाना जाता था तो वे थे शशांक शेखर. यदि कहें तो वे इस शहर की सत्ता और ताकत के प्रतिनिधि बन गए थे. लखनऊ राजधानी बनने के समय से ही उत्तर प्रदेश की राजनैतिक और प्रशासनिक ताकत का केन्द्र माना जाता रहा है और शशांक शेखर में एक साथ प्रशासनिक और राजनैतिक ताकत का भरपूर मिश्रण खुलेआम दिखता था. यदि हम इस रूप में देखें तो वे इस शहर की बुनियादी सोच और चरित्र के शानदार प्रतिनिधि बन कर छाए रहे थे.

जब उनकी आकस्मिक मौत की खबर आई तो इसने अन्य लोगों की तरह मुझे भी विस्मृत कर दिया. भावना का जो ज्वार मुझमे आया वह उस हद तक सहानुभूति और लगाव के कारण नहीं बल्कि मृत्यु से जुडी अजीबोगरीब कशिश, भयावहता और सम्मोहन से जुड़ा हुआ था.

जब मैं कल दफ्तर से घर लौट रहा था तो भैंसाकुंड, जो एक बार पुनः इस शहर की एक खास निशानी है और शहर का खामोश हस्ताक्षर भी, पर भारी भीड़ देख कर समझ गया कि ये शशांक शेखर की अंत्येष्ठी से जुड़े लोग हैं.

यहाँ मैंने एक बार पुनः यह समझा कि कोई व्यक्ति शशांक शेखर के प्रति व्यक्तिगत कैसी भी भावना रखता हो पर सच्चाई यही है कि वे उन लोगों में रहे जिन्होंने इस शहर की नब्ज को पहचाना और यहाँ अपनी बुद्धि, विवेक, प्रतिभा और मेहनत से ताकत का सूत्र समझा और उसे हासिल किया. उनके शव के इर्द-गिर्द लिप्त माहौल खुदबखुद यह बता रहा था कि मरने वाला व्यक्ति जोई साधारण शख्सियत नहीं था बल्कि रसूखवाला था, वही रसूख जिसे हासिल करने के लिए पूरे प्रदेश से लोग यहाँ आते हैं पर हर कोई उतना सफल नहीं होता जितने शशांक शेखर हुए.

शशांक शेखर चले गए- शहर का एक और ताकतवर आदमी भैंसाकुंड वासी हो गया लेकिन शहर की आपाधापी और सफलता की चाह तो निरंतर चलती रहेगी. आखिर नवाबों की यह नगरी आज भी सत्ता का केन्द्र जो है.

Shashank Shekhar Singh: Born to Command



The man whose cremation was to take place had never been a favourite of mine. While I personally could be anything- good or bad, righteous or unjust, but the fact remains that I always had the highest regard for people who have genuinely and truthfully abided by laws. Thus to take a random name, I always admired Devesh Chaturvedi, who had been my District Magistrate in Pithoragarh and Deoria, for the simple fact that Devesh believed in the supremacy of law- for one and all, including himself.

From, whatever I had heard of Shashank Shekhar Singh, Triple S as he was often called, I was always wary of him. His image in my mind was that of a person who was not made for law, but for whom law molded and amended itself. And I can say with surety that I was not the only person who thought in this particular manner. A very large section of the bureaucracy often echoed this feeling, when talking in their private conversations.

But as the saying goes- Nothing succeeds like success and Shashank Shekhar succeeded in Uttar Pradesh bureaucracy like no one had before him and possibly no one will again in a long time to come.

The five year period 2007-2012 definitely added to his image, power and persona. It made him a larger than life figure- at least in the power corridors of UP, with its reverberations being seen naturally all across the State and also in the country.

Thus Shashank Shekhar was a mysterious figure in the eyes and opinions of many who equated him with power and authority.

When his death came all too suddenly and all too quickly after his retirement only a few ago, it shocked most of the people. While not knowing much about others, at least my natural feeling was that of strange remorse and vacuum. Being truthful to myself, I would admit that it was not primarily guided by some genuine emotional outburst for the departed soul, because it had never been so, but was the result of the strange eeriness that death often accompanies.

When coming back from the office yesterday, I saw a large gathering at Bhaisa Kund, the Lucknow funeral ground, my feet automatically stopped in strange fascination of death.

It was here that I once again realized that whether one hated or loved Shashank Shekar, the fact remains that he was a powerful persona, someone who commanded authority and had aura around him- something which had not left him even after death.

In the midst of the people present there one could see many powerful people- bureaucrats, police officers, politicians etc, along with media persons rushing around to get a snap of the man who lived and died like a King. Even the way his body had been wrapped so elegantly and delicately seemed to be a homage to the man who was always believed to have fine tastes in life.

My stay at Bhaisa Kund convinced me once more that this man was different from others and he was born to command.

Suggestion for forming Government Bodies for Astrologers and God-men/religious entities



To,
The  Hon’ble Prime Minister of India,
Government of India,

New Delhi
 
Subject- Suggestion for forming Government Bodies for Astrologers and God-men/religious entities

Dear Sir,

1. We, petitioners No 1 and 2 introduce ourselves as under-
Petitioner No 1- Amitabh Thakur is an officer of the Indian Police Service, Uttar Pradesh Cadre and is also active as regards issues of transparent and accountable governance, along with Right to Information (RTI, for short)
Petitioner No 2- Dr Nutan Thakur is a social activist and freelance journalist associated with transparency in Governance and Human Right issues, along with RTI matters

2. That both the petitioners write this representation in their personal capacity as the citizen of this Nation and as concerned individuals.
3. That the two petitioners present a serious matter associated with Astrologers and God-men/religious entities
4. That as is well known, in India there are a very large number of Astrologers and God-men/religious entities. Each of these Astrologers and God-men/religious entities claim themselves to be having supernatural powers. They make very tall claims. Many a times they impersonate others including God..
5. That these Astrologers and God-men/religious entities are important entities in our society. They are omnipresent and can be seen in every nook and corner of the country. These Astrologers and God-men/religious entities operate in various ways. But one thing common to most of them is the fact that the majority seek money on one form or another. It can be some kind of fee, honorarium, gift, donation or any other format.
6. That this act of taking money or other financial resources from the people makes these Astrologers and God-men/religious entities some kind of professional entities. Though they claim themselves as being otherworldly, but the mere fact that they accept monetary support in various forms makes their act a purely temporal work where there is transition of money from one hand to another.
7. That this transition of money is often in lieu of certain acts performed by these Astrologers and God-men/religious entities. They look at the person’s futures, perform some kind of religious acts, give some preaching or sermons  etc.
8. That thus, in totality, this act of providing service in lieu of certain monetary returns (in whatever form it might be presented) makes the act of Astrologers and God-men/religious entities a professional work as well.
9. That thus like every other profession including Medicine, engineering, dentistry, law, architect etc,  these works also need a regulation/control at various levels.
10. That this is because if the State does not come forward to have some kind of appropriate regulatory mechanism for certain acts where lives of billion of people is affected and where there is a direct temporal act of presenting money in lieu of certain returns is being done in almost a professional manner, then it will certainly adversely affect the lives of these people.
11. That the result of completely uncontrolled situation would be that every person would be free to claim himself as Astrologers and God-men/religious entities of the highest order. With no control and no regulation, they would make tall claims as is presently seen in many cases and would cheat by common, illiterate and semi-literate poor and fearful people by showing them all kinds of improper and incorrect ways, paths, does and don’ts etc which these people, having not enough sense to differentiate between cheating and truth, often follow to the hilt and also get cheated.
12. That it is true that there cannot be very exact estimation of every person as Astrologers and God-men/religious entities and the level achieved by them. It is also true that outsiders might not be in a position to evaluate their worth or to exactly place them as regards their caliber. But if one or more National and Regional Committee/Commission/ Council etc are formed by the Government of India and the various State governments which act as a professional body for these Astrologers and God-men/religious entities, then these bodies can certainly check, evaluate and mark the caliber of these entities.
13. That the two petitioners suggest that these Bodies have members only from the professional world or from the field of activity, that is, among the Astrologers and God-men/religious entities. They also suggest that there shall be no official members to these bodies. They suggest these bodies to be autonomous in nature.
14.  That thus while the petitioners respect the sanctity and independence of these professions and work and hence they propose Regulatory bodies consisting solely of the persons belonging to these profession/field, who might be chosen by themselves in a suitable manner, yet at the same time they also understand the great need to have such regulatory bodies.
15. That thus the two petitioners hereby propose formation of at least two such Regulatory/controlling/professional bodies, one for the Astrologers and the other for God-men/religious preachers etc, which shall act as the regulatory authority for both Astrologers and also for proclaimed Godmen/religious leaders/occult science practitioners etc.
16. That as proposed above, such Regulatory Bodies shall consist members entirely from these profession/art/field because possibly the outsiders and ignorant people won’t be in a position to understand, appreciate and evaluate the basic caliber and abilities of these people and to certify their genuineness or otherwise.
17. That as explained earlier, there is an immense need to have such regulatory bodies at various levels so as to separate the grain from the chaff, that is to do away with the charlatans, fakes, frauds, phonies and bogus Astrologers, Godmen/religious leaders/occult science practitioners etc from the real ones and thus save the common people from these frauds, who everyone would agree abound in very large number in this country.
18. That the petitioners are writing directly to you because thus action possibly needs the coming together or one or more Ministries and such a coordination might be possible only at the level of the Hon’ble Prime Minister’s office
19. That thus we make the following prayers for the larger public interest—


PRAYER


A.      To kindly form a Council/Professional body/Regulatory or controlling body consisting completely of astrologers for these persons at National, State and/or Regional levels which shall be evaluating their genuineness or otherwise and fitness or otherwise to practice their art/science and only after this verification any astrologer shall be allowed to practice this art/science and this body shall be acting as the Nodal bodies for the astrologers almost in a way Medical Council of India, Indian Council of Chartered Accountants or Bar Council of India works
B.      To kindly form a Council/Professional body/Regulatory or controlling body for the God-men, occult science practitioners, professional preachers etc consisting completely of astrologers at National, State and/or Regional levels which shall be evaluating the genuineness or otherwise and fitness or otherwise of these persons to practice their art/science science and only after this verification any such person shall be allowed to practice this art/science and this body shall be acting as the Nodal bodies for the astrologers almost in a way Medical Council of India, Indian Council of Chartered Accountants or Bar Council of India works

Lt No-AT/Astro/01                                                                                                      Yours,
Dated- 13/06/2013
                                                                                                                                1. Amitabh Thakur
                                                                                                                                2.Nutan Thakur
                                                                                                                    Correspondence Address-
                                                                                                                                Amitabh Thakur,
                                                                                                                           5/426, Viram Khand,
                                                                                                                                Gomti Nagar,
                                                                                                                                Lucknow- 226010
                                                                                                             # 94155-34526, 94155-34525
                                                                                                   email-
amitabhthakurlko@gmail.com
                                                                                                                
nutanthakurlko@gmail.com